नवकार मंत्र

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जिसमे कम शब्दों में अधिक भाव और विचार हों और जो कार्यसिद्ध में सहायक हो, जिसके मनन से जीव को रक्षण प्राप्त हो , उसे मंत्र कहते है | नवकार मंत्र का अर्थ है – नमस्कार मंत्र | प्राकृत भाषा में नमस्कार को ‘ णमोक्कर ‘ कहते है | इसमें पाँच पदों को नमन किया गया है | इनमे से दो देवपद (अरिहंत अरु सिद्ध ) एवं शेष तीन गुरु पद (आचार्य , उपाध्याय एवं साधू ) है | ये पाँचो पद अपने आराध्य या इष्ट होने के साथ हमेशा परम ( श्रेष्ट ) भाव में स्थित रहते है | इसलिये इन्हें पंच परमेष्टी भी कहा गया है | इस मंत्र के उच्चारण से पापो का नाश होता है | यह मंगलकारी है | ‘म’ का अर्थ है -पाप और ‘गल ‘ का अर्थ -गलाना | जो पाप को गलावे , वह मंगल है | नवकार मंत्र से पाप का क्षय होता हिया , पाप रुकते है , इसलिए नवकार मंत्र मंगल रूप है | नवकार मंत्र में ५ पद व् ३५ अक्षर है | चूलिका को मिलाने पर कूल ९ पद और ६८ अक्षर होते है | नवकार मंत्र में ‘णमो’ शब्द धर्म पद है | क्योकि ‘णमो’ विनय का प्रतिपादक है | विनय ही धर्म का मूल है | नवकार मंत्र प्राकृत (अर्धमागधी प्राकृत) भाषा में है|

जिन्होंने चार घाती कर्मो -ज्ञानावरणीय , दर्शनावरणीय मोहनीय और अन्तराय का क्षय करके अनंत ज्ञान, अनन्त दर्शन , अनन्त चरित्र और अनन्त बल कर लिया हिया , उन्हें अरिहंत कहते है , इन्हें तीर्थकर या जिन भी कहते है |

जो आठों कर्मो का क्षय कर चुके है तथा जिन्होंने आत्मा के आठों गुणों को हमेशा के लिए सम्पूर्ण रूप से प्रकट कर लिया है , उन्हें सिद्ध कहते है |

अरिहंत भगवान् चार धाती कर्मो – ज्ञानावरणीय , दर्शनावरणीय , मोहनीय और अन्तराय का क्षय कर चुके है | अरिहत्न सशरीरी होने से तीर्थ की स्थापना करते है , उपदेश देते है और धर्म से गिरते हुए साधकों को स्थिर करते है ,जबकि सिद्ध आठ कर्मो (१. ज्ञानावरणीय , २. दर्शनावरणीय ,३.मोहनीय,४. अन्तराय ,५. वेदनीय, ६. आयु ७.नाम ८.गोत्र ) को क्षय करके सिद्ध हो गये है और वे सुखरूप सिद्धालय में विराजमान है |वे अशरीरी होने से उपदेश आदि की प्रवृति नहीं करते है |

अरिहंत धर्म को प्रकट कर मोक्ष की रह दिखाने वाले और सिद्धो की पहचान कराने वाले है | अरिहंत सशरीरी है और सिद्ध अशरीरी | परम उपकारी होने के कारण सिद्धो के पहले अरिहंतो को नमस्कार किया गया है |

चतुर्विघ संध के वे श्रमण , जो संघ के नायक होते है और जो स्वंय पंचाचार का पालन करते हुए साधू – संघ में भी आचार पालन कराते है , उन्हें आचार्य कहते है | ये ३६ गुणों के धारक होते है |

वे श्रमण, जो स्वंय शास्त्रों का अध्ययन करते है और दुसरो को अध्ययन करवाते है, उन्हें उपाध्याय कहते है | ये २५ गुणों के धारक होते है |

गृहस्थ धर्म का त्याग कर जो पाँच महार्व्रत -१. अहिंसा , २.सत्य ३. अचोर्य ४. ब्रहमचर्य और ५. अपरिग्रह को पालते है एवं शास्त्रों में बतलाये गये समस्त आचार सम्बन्धी नियमो का पालन करते है , उन्हें साधू कहते है | ये २७ गुणों के धारक होते है |